Friday, June 20, 2008

निर्णय लेने से पहले

जिंदगी कभी कभी ऐसी परिस्थितियौं से दो चार कराती है कि निर्णय लेना काफी दुश्वार हो जाता है। क्या सही है क्या ग़लत है इस ऊहापोह में ही उलझ कर रह जाते हैं। हम अक्सर किसी परिस्थिति या व्यक्ति को मात्र एक घटना के आधार पर सही या ग़लत से नवाज़ देते हैं। जबकि मुझे लगता है कि हर चीज़ को बिना समग्रता से देखे वास्तविक नतीजे पर पहुँचाना ग़लत होगा। जैसे, हो सकता है कि एक कातिल , प्यारा पिता हो । कभी कभी हम परिस्थितियौं के शिकार हो जाते हैं और हम वो कर जाते हैं जो शायद हम नहीं होते हैं, कभी तो ये अच्छा होता है और कभी बुरा। तो जरूरत इस बात की है कि हम एक समग्र नजरिया रखें।

Monday, June 2, 2008

मनसिज तीर चलता है, प्रेम स्वपन दिखाता है,

फागुन मे लाज हीना हैं , मेला घूमते से पात

आवारा आज बने होली में बंजारा तन मन के गात,

रंग कुंडल आज पहन मदिर हो ये फागुनी प्रात

मेरी कॉलेज लाइफ

फ़िर कभी