Tuesday, October 14, 2008
कल और आज
आप सोच रहे होंगे की ये कैसा शीर्षक है ? चलिए शायद इस ब्लॉग के अंत तक आपको पता चल जाए। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मेरी साइकिल आई थी, उस दिन की खुसी को शब्दों में बयां करना बहुत कठिन है पर जब मै इसकी तुलना कुछ दिन पहले खरीदी गई कार से करता हूँ तो न जाने क्यूँ खुसी का एहसास नही होता। क्या हम अब किसी बहुत बड़ी खुसी के इंतज़ार में जिंदगी की उन तमाम छोटी छोटी खुशियों को नजरअंदाज करते जा रहे हैं। क्या हमारी बोद्धिकता ने हमारे जीवन को को एकदम से नीरस बना दिया है ।
Friday, July 4, 2008
छोटी छोटी खुशियाँ
बारिश की बूँदें, आकाश में बादल, हरी घांसों से भरा मैदान, ये सब कुछ ऐसी चीजें हैं जो शायद हमे वो न दे जो हमें चाहिए, शायद ये सब एक बड़ी खुशी की जगह न ले सके पर ये छोटी छोटी बातें हमे जीना सिखाती हैं वो भी हंसते हुए। मुझे आज भी याद है एक वो समय भी था जब मुझे ये सारी चीजें किसी भी तरह से आकर्षित नहीं करती थीं ।
एक बार मैंने haribansh rai bacchan की एक कविता padhi थी जो कुछ इस तरह से थी
जो बीत गयी वो बात गयी
ambr के aanan को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
पर अपने टूटे तारों पर
कब ambar शोक manata है
मेरी nakaratmak सोच की hadh देखिये की मैंने इसके आगे लिख दिया
हाँ अपने टूटे तारों पर ambar भी शोक manata है
अपने megho के आँखों से वो भी neer Bahaata है
फिर मैं कैसे कह दूँ जो बीत गयी वो बात गयी ।
सो, दोस्तों इस तरह की nakaaratmakta से bachen और जिंदगी के हर एक pal को khusiyon से bahr दे ।
एक बार मैंने haribansh rai bacchan की एक कविता padhi थी जो कुछ इस तरह से थी
जो बीत गयी वो बात गयी
ambr के aanan को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
पर अपने टूटे तारों पर
कब ambar शोक manata है
मेरी nakaratmak सोच की hadh देखिये की मैंने इसके आगे लिख दिया
हाँ अपने टूटे तारों पर ambar भी शोक manata है
अपने megho के आँखों से वो भी neer Bahaata है
फिर मैं कैसे कह दूँ जो बीत गयी वो बात गयी ।
सो, दोस्तों इस तरह की nakaaratmakta से bachen और जिंदगी के हर एक pal को khusiyon से bahr दे ।
Friday, June 20, 2008
निर्णय लेने से पहले
जिंदगी कभी कभी ऐसी परिस्थितियौं से दो चार कराती है कि निर्णय लेना काफी दुश्वार हो जाता है। क्या सही है क्या ग़लत है इस ऊहापोह में ही उलझ कर रह जाते हैं। हम अक्सर किसी परिस्थिति या व्यक्ति को मात्र एक घटना के आधार पर सही या ग़लत से नवाज़ देते हैं। जबकि मुझे लगता है कि हर चीज़ को बिना समग्रता से देखे वास्तविक नतीजे पर पहुँचाना ग़लत होगा। जैसे, हो सकता है कि एक कातिल , प्यारा पिता हो । कभी कभी हम परिस्थितियौं के शिकार हो जाते हैं और हम वो कर जाते हैं जो शायद हम नहीं होते हैं, कभी तो ये अच्छा होता है और कभी बुरा। तो जरूरत इस बात की है कि हम एक समग्र नजरिया रखें।
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