Tuesday, October 14, 2008
कल और आज
आप सोच रहे होंगे की ये कैसा शीर्षक है ? चलिए शायद इस ब्लॉग के अंत तक आपको पता चल जाए। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मेरी साइकिल आई थी, उस दिन की खुसी को शब्दों में बयां करना बहुत कठिन है पर जब मै इसकी तुलना कुछ दिन पहले खरीदी गई कार से करता हूँ तो न जाने क्यूँ खुसी का एहसास नही होता। क्या हम अब किसी बहुत बड़ी खुसी के इंतज़ार में जिंदगी की उन तमाम छोटी छोटी खुशियों को नजरअंदाज करते जा रहे हैं। क्या हमारी बोद्धिकता ने हमारे जीवन को को एकदम से नीरस बना दिया है ।
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